मैं आग से खेल रहा हूं, के निहितार्थ क्या हैं?

विपक्ष के नेता (एलओपी) राहुल गांधी ने ऐसा क्यों कहा कि ‘मैं जानता हूँ कि मैं आग से खेल रहा हूँ’, और इस खेल में क्या-क्या खतरे हैं। उसे भी मैं समझता हूँ। लेकिन इसके साथ उन्होंने यह भी कहा कि मैं डरता नहीं हूँ। वे डरे हुए लोग हैं। जो षड्यंत्र रचते हैं।
सवाल यह है कि संसद में विपक्ष का नेता (नेक्स्ट टू प्राइम मिनिस्टर) अगर डरा देने वाले निष्कर्ष तक पहुँच गया है। तो लोकतंत्र, बराबरी और न्याय के लिए आवाज़ उठाने वाले आम नागरिकों का क्या होगा। राहुल गांधी के इस अनुभूति तक पहुँचने के क्या कारण हो सकते हैं। भारतीय लोकतंत्र के अंदर वह कौन-सी अंत:क्रियाएँ चल रही हैं। जिसकी गति का अध्ययन करने के बाद राहुल गांधी इस निष्कर्ष तक पहुँचे हैं कि वे आग से खेल रहे हैं। तो सवाल है कि माचिस की तीली किसके हाथ में है। उसकी पहचान राहुल गांधी को सार्वजनिक करना चाहिए। एल ओ पी की भूमिका निभाते हुए राहुल गांधी सरकार की नीतिगत आलोचना या सरकार के फैसलों की चीर-फाड़ करना उनका संवैधानिक अधिकार और दायित्व हैं। तो वे इसे आग से खेलना क्यों कह रहे हैं।

वे जो बात सार्वजनिक मंच से कह रहे हैं। वह सामान्य नहीं है। इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता है और न विरोधी दल के नेता की सामान्य टिप्पणी मानकर खारिज किया जा सकता है। क्योंकि लोकतांत्रिक परंपरा में विपक्ष का नेता छाया प्रधानमंत्री के रूप में देखा जाता है। पिछले कुछ दिनों से राहुल गांधी सरकार के समक्ष ऐसे प्रश्न खड़े कर रहे हैं। जिनसे सर्वसत्तावादी मोदी सरकार असहज महसूस कर रही है। ये सवाल तात्कालिक घटनाओं से संबंधित होने के साथ-साथ मोदी सरकार के बुनियादी चरित्र से जुड़े हैं। जिससे आम नागरिक की समझ बन रही है कि मोदी सरकार असहमति और विरोध को लोकतांत्रिक भावना के तहत स्वीकार न करके दबाने के लिए सत्ता का दुरुपयोग कर रही है।

अगर इसके वैचारिक जड़ों की तलाश की जाए तो हम पाएँगे कि हिंदुत्ववादी चिंतन में अंतर्निहित लोकतंत्र के निषेध की मूल विचारधारा और सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि का होना है। चूँकि सामाजिक समानता और नागरिक स्वतंत्रता के निषेध की आधारशिला पर हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना विकसित हुई है। इसलिए आधुनिक लोकतंत्र हिंदुत्व के लिए पराई विचारधारा है। जिसे वह भारतीय संस्कृति और चिंतन परंपरा के विपरीत में देखता है। संघ के राजनीतिक चिंतन के मूल में एकात्मक राष्ट्रवाद की विचारधारा है। जहाँ विविधता, मत भिन्नता शत्रुता का रूप ले लेती है। इसलिए मोदी के नेतृत्व वाली सरकार सवाल उठाने वालों और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से छुटकारा पाने के लिए कानून के शासन से इतर जाकर सत्ता के दुरुपयोग व षड्यंत्र के रास्ते का अनुसरण करती है।

वर्तमान समय में हिंदुत्ववादियों और कॉर्पोरेट पूँजी के गठजोड़ के हाथ में राजसत्ता है। दोनों अति केंद्रीकृत धुरी पर टिकी विशिष्ट किस्म की आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक संरचना का प्रतिनिधित्व करते हैं। मोदी का तो नारा ही है मजबूत सरकार।
यहाँ एक तथ्य पर नज़र डाल लेना ज़रूरी है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से ही पूँजी की लूट व वर्चस्व की राजनीतिक संस्कृति को उखाड़ फेंकने वाली विचारधाराएँ राज्य के निर्मम दमन का शिकार होती रही हैं। शोषण और लूट की व्यवस्था के निषेध की वैचारिकी विकसित करने वाले मार्क्सवादी दर्शन के अनुयायी उपनिवेशवाद के दौर से आज तक भारतीय राज्य के निशाने पर रहे हैं। शहादतें होती रही हैं। हज़ारों कार्यकर्ता और नेता मारे गए हैं। स्वतंत्रता के आंदोलन और उसके बाद भी बुनियादी परिवर्तन की ताकतों और राजनीतिक संगठनों को राज्य दमन झेलना पड़ा है। नज़ीर के तौर पर भगत सिंह के साथियों से लेकर तेलंगाना और नक्सलवादी विद्रोह तक इसकी निरंतरता बनी हुई है। आज भी आदिवासियों, जनजातियों, एथनिक क्षेत्रीय भाषाई समूहों के साथ दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक, मज़दूर, किसान जैसे तबकों को दमन, उत्पीड़न और जनसंहार से गुज़रना पड़ रहा है।

(नक्सलवादी संघर्ष के मशहूर नायक नागभूषण पटनायक ने फाँसी की सजा की घोषणा के बाद राष्ट्रपति के नाम लिखे पत्र में कहा था कि क्रांति के मार्ग पर कदम रखने वाला क्रांतिकारी यह मानकर नहीं चलता है कि कोई न कोई संयोग उसके जीवन की रक्षा करता रहेगा। ऐसा संभव नहीं होता। यानी वर्ग समाज में इस मार्ग पर चलने पर बलिदान और कुर्बानी अवश्यंभावी है।)
इसलिए बस्तर के जंगलों में सक्रिय माओवादियों से लेकर भीमा कोरेगाँव और दिल्ली दंगों तक बुद्धिजीवी, सामाजिक-राजनीतिक, लोकतांत्रिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता राज्य दमन के निशाने पर थे और आज भी हैं। यह दमन वर्ग-राज्य में स्वाभाविक है। अगर प्रचलित राजनीतिक भाषा में कहा जाए तो यह वर्ग युद्ध का जारी रूप है। जिसमें कोई भी वर्ग अपने वर्ग विरोधी पर रहम नहीं करता।
लेकिन ऐसा व्यक्ति जो सत्ता के बीच में ही जन्मा हो। जो राज्य की समस्त विशिष्टताओं और अंतर्निहित क्षमता और संरचना से पूर्णत: वाकिफ़ हो। सत्ता की संस्कृति के बीच पला-बढ़ा और निर्मित हुआ हो। यानी शासक वर्ग का अभिन्न अंग हो। (वे एल ओ पी हैं।) राज्य के गतिविज्ञान और कार्यप्रणाली को समझता हो। इसलिए उसे डर नहीं लगता है। प्रिविलेज क्लास का होने के बावजूद कहे कि वह जानता है कि आग से खेल रहा है। तो यह चिंतनीय प्रश्न बन जाता है।

ऐसे डरावने समय में सभी लोकतांत्रिक नागरिकों को सोचना होगा कि हमारा लोकतंत्र किस दिशा में जा रहा है। क्या निकट भविष्य में कोई बुनियादी संस्थागत परिवर्तन होने वाला है। जिसको लेकर राहुल गांधी कह रहे हैं कि वह आग से खेल रहे हैं। यानी शासक वर्ग के मध्य कोई ऐसा अघोषित राजनीतिक संघर्ष चल रहा है। जिसकी परिणति आग, खून और विध्वंस में हो सकती है।
इसलिए सभी लोकतांत्रिक नागरिकों को भविष्य में सत्ता की जड़ों की गहराइयों से फूट पड़ने वाले राजनीतिक भूचाल को देखते हुए अपनी तैयारी को उन्नत कर लेना चाहिए।
चूँकि 1975 में शासक वर्ग के आपसी टकराव के तेज़ होने से भारत आपातकाल के अंधकार युग से गुज़र चुका है। शासक वर्गों के मध्य आपसी टकराव समाज के अंदर मौजूद ढाँचागत संकटों के समाधान न हो पाने के दौर में ही सतह पर आते हैं। (जिनके बीज 1967 के नक्सलवादी विद्रोह में देखा जा सकता है।) अगर 1947 में बनी सत्ता संरचना के अंदर मौजूद आंतरिक सहमति के बिखर जाने का संकेत 2014 के बाद से दिखाई दे रहा है। तो निश्चय ही आज का मंज़र 1975 से ज़्यादा भयानक है।
इससे एक बात स्पष्ट है कि वर्तमान शासक वर्ग का आंतरिक अंतर्विरोध संघ-नीति मोदी सरकार में चरम पर पहुँच गया है। जिसका समाधान संवैधानिक जनतंत्र के आवरण में संभव नहीं दिखाई दे रहा। राहुल गांधी पर लगातार थोपे जा रहे मुकदमों से लेकर अरविंद केजरीवाल, सत्येंद्र जैन, हेमंत सोरेन, जिग्नेश मेवानी, महाराष्ट्र के अनिल देशमुख सहित दर्जनों मंत्रियों, नेताओं, नौकरशाहों (संजीव भट्ट, प्रदीप शर्मा), उद्योगपतियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ सत्ता प्रायोजित हमला इस बात की पुष्टि कर रहा है कि व्यवस्थागत संकट गहरा हो गया है और उसके गर्भ में लोकतंत्र को ढहा देने वाली अंत:क्रियाएँ तेज़ हो गई हैं। यानी देश हिंदुत्व-कॉर्पोरेट फासीवाद के मुहाने पर खड़ा है।
आज़ादी के विराट संघर्ष के बीच से भारत का वर्तमान शासक वर्ग संगठित हुआ था। लगभग 100 वर्षों के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान वह इतना सशक्त हो गया कि 1947 में राज्य की बागडोर उसके हाथ में हस्तांतरित हो गई। आज़ादी के संघर्ष के दौर में ही अनेक तरह के शासक समूह जन्म लिए और संगठित हुए। जिनके बीच में बना समन्वय कई तरह के उतार-चढ़ाव से गुज़रते हुए भी 2014 तक भारत की सत्ता पर काबिज़ रहा था। लेकिन ऐसा लगता है कि उदारीकृत भारत में यह समन्वय बिखरने के ऐतिहासिक मोड़ तक पहुँच गया है।

लोकतंत्र के अंतर्निहित (पूँजीवाद में यह संकट चक्रीय रूप से प्रकट होता है) संकट के कारण स्वतंत्रता आंदोलन से बाहर रहने वाली तथा औपनिवेशिक सत्ता समर्थक फासीवाद की वैचारिकी से प्रेरित हिंदू राष्ट्रवाद का झंडा उठाएँ और आधुनिक संघात्मक लोकतांत्रिक भारत की संपूर्ण अवधारणा की विरोधी ताकतें अब पतनशील लुटेरी कॉर्पोरेट पूँजी के साथ घुल-मिलकर राज्य के रूप में संगठित हो चुकी हैं। कॉर्पोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ मूलत: सार्वभौम संघात्मक लोकतांत्रिक गणराज्य की अवधारणा के निषेध पर विकसित हुआ है। इसलिए उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलन से निकले भारतीय गणराज्य के साथ इसके रिश्ते शत्रुतापूर्ण हैं। वस्तुत: एल ओ पी राहुल गांधी इसी बुनियादी टकराव की तरफ़ संकेत करते हुए कह रहे हैं कि वे आग से खेल रहे हैं।

1975 के आपातकाल और वर्तमान अघोषित आपातकाल के चरित्र में बुनियादी फ़र्क है। 1975 में इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया था। कारण था रूलिंग क्लास दो हिस्सों में बँटा हुआ था, उनके आपसी टकराव से राजनीतिक संकट पैदा हो गया था। लेकिन विपक्ष मज़बूत था। उसकी सामाजिक वैधता बनी हुई थी। अधिकांश बड़े नेता स्वतंत्रता आंदोलन से निकलकर आए थे। दूसरी तरफ़ कांग्रेस के पास संगठित नफ़रती षड्यंत्रकारी बहु-आयामी अर्धगुप्त संगठन नहीं था। या यूँ कहें कि विध्वंसक साम्प्रदायिक कार्यकर्ता पैदा करने वाली फ़ैक्ट्री नहीं थी। मोदी सरकार के पीछे संघ जैसी सवर्ण सामंती सामाजिक आधार और कॉर्पोरेट के गठजोड़ के साथ हिंदू राष्ट्रवादी फासीवादी विचार के घोल से तैयार जटिल सांगठनिक ढाँचा है।

जो भारतीय लोकतंत्र के संकट के कई मोड़ों पर अपनी ताक़त दिखा चुका है और राज्य के रूप में संगठित होने के क्रम में ही कई बार भारतीय राज्य को घुटने के बल ला चुका है। यही नहीं, वह भारतीय राज्य और उसकी लोकतांत्रिक संस्थाओं को पैरालाइज़ करने की क्षमता रखता है। जिसे हम 1990 से 1992 के दौरान व 2013-14 के अन्ना आंदोलन के समय देख चुके हैं। यही नहीं, 2013 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की चार कमिश्नरियों में हम उसकी विध्वंसक लीला का प्रसाद चख चुके हैं। जब एक सामान्य घटना को केंद्रित कर संघ-भाजपा के प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं ने ऐसा दंगाई माहौल बनाया कि 50 हज़ार से ज़्यादा मुसलमानों को विस्थापित होना पड़ा और दोनों पक्षों के दर्जनों लोग मारे गए। उस समय समाजवादी पार्टी की सरकार किंकर्तव्यविमूढ़ होकर यह विनाश लीला देखती रही। इसलिए हमें 1975 और 2014 के बाद के दौर के बुनियादी फ़र्क को दिमाग़ में अवश्य रखना चाहिए।

संघ-नीति मोदी सरकार के पास नकारात्मक एजेंडा है। उस एजेंडे का कॉर्पोरेट मीडिया में विलय हो चुका है। प्रचार तंत्र और मीडिया पर उसका नियंत्रण है। इसलिए यह स्थाई चरित्र और टिकाऊ जनाधार पर खड़ा फासीवादी परियोजना से लैस आंतरिक आपातकाल है। 2014 के बाद मोदी सरकार ने 11 वर्षों में एक-एक कर सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं को नियंत्रित कर लिया है। मालेगाँव में बम विस्फोट के अभियुक्तों को न्यायालय द्वारा दोषमुक्त हो जाने की घटना ने आने वाले भविष्य का संकेत दे दिया है। इसे आप हेमंत करकरे की दूसरी बार न्यायिक हत्या के तौर पर देख सकते हैं।
दूसरा- मोदी-शाह राज की चारित्रिक विशिष्टताओं को गुजरात से लेकर दिल्ली की सत्ता तक पहुँचने और उसके बाद के काल में स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। 2002 के गुजरात दंगे से संबंधित 40-45 सेकंड का एक वीडियो भाजपा नेता और गुजरात के गृहमंत्री रह चुके हरेन्द्र पांड्या का सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। आप जानते हैं कि गुजरात के ताक़तवर नेता हरेन्द्र पांड्या के साथ क्या हुआ। दूसरी तरफ़ अमित शाह का केस देख रहे जस्टिस लोया की मृत्यु का रहस्य आज भी फ़िज़ा में गूँजता रहता है। लोया के मित्र पूर्व जस्टिस कोल्से पाटिल से लेकर पत्रकार निरंजन टाकले तक बरसों से जो कुछ कहते चले आ रहे हैं। वह डरा देने वाला सच है। मोदी राज में पुलवामा, पहलगाम, उरी जैसी घटनाओं पर भाजपा सरकार के पूर्व मंत्रियों और नेताओं के विचार आ चुके हैं। (सुब्रह्मण्यम स्वामी और जसवंत सिंह।) पुलवामा के समय भाजपा सरकार के कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने जो कुछ कहा है। ‘वह समझदार के लिए इशारा काफ़ी है।’ वाली कहावत को चरितार्थ करता है।

ये सभी तथ्य मोदी के गुजरात से लेकर दिल्ली तक के सफ़र में घटित प्रत्येक घटनाओं को संदिग्ध बना देने के लिए काफ़ी हैं। भाजपा के कई बड़े नेताओं और नौकरशाहों की दुर्घटना में मौत, आत्महत्याएँ और आतंकी घटनाएँ कई तरह के सवालों को जन्म देती रही हैं। जिनको लेकर गठित जाँच कमेटियों या आयोगों की रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक होने का इंतज़ार कर रही हैं।
भ्रष्टाचार से संबंधित फ़ाइलों का ग़ायब होना, न्यायालय में बंद लिफ़ाफ़े में दी जाने वाली रिपोर्ट और देश की सुरक्षा के नाम पर सरकार द्वारा छिपाई जाने वाली सूचनाएँ स्थिति की गंभीरता को व्यक्त करती हैं।
इसलिए अगर राहुल गांधी भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार, वोट की लूट और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर क़ब्ज़ा करने की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं। तो निश्चय ही वह आग से खेल रहे हैं। राहुल का यह कहना मोदी राज के पिछले 25 वर्षों के घटनाक्रमों को देखते हुए कई तरह की आशंकाओं को जन्म देता है। इसलिए राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी को इस बात का खुलासा करना चाहिए कि वे इस डरावने मूल्यांकन तक कैसे पहुँच गए हैं।
पिछले कुछ दिनों से राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मोदी-शाह की जोड़ी भारतीय लोकतंत्र के बुनियादी ढाँचे को बदलने की दिशा में काम कर रही है। भाजपा के कई नेता, सांसद, मंत्री संविधान बदलने की बातें करते रहे हैं। संघ उपप्रमुख होसबोले ने कुछ दिन पहले कहा है कि अब संविधान समीक्षा का समय आ गया है। हमें इस दिशा में काम करना चाहिए। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से लेकर अधिकारियों, सचिवों, ईडी, सीबीआई, आईटी जैसी संस्थाओं में नियुक्तियों पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। ईडी के चीफ़ संजय मिश्रा के कार्यकाल बढ़ोतरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को हस्तक्षेप करना पड़ा था।

इसका मतलब स्पष्ट है कि भारत में पिछले 75 वर्षों से चल रहे संवैधानिक गणतंत्र पर ख़तरा वास्तविक है। इसलिए लोकतंत्र के भविष्य को लेकर चिंताएँ गहरी हो गई हैं। क्या भारत में एक ख़ास तरह की तानाशाही आकार लेने जा रही है? राहुल गांधी द्वारा वोट चोरी के खुलासों के बाद पिछले कुछ घंटों से यह सवाल फ़िज़ाओं में तेज़ी से गूँज रहा है।
वर्तमान साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी नियंत्रित विश्व में राज्य के जितने भी मॉडल हैं। इसमें सबसे क्रूर मॉडल धर्म और राज्य के विलय का मॉडल है। इसलिए जिन देशों में यह मॉडल सत्ता पर क़ाबिज़ हुआ है। वहाँ लोकतंत्र खोखला हो जाता है। चुनाव परिणाम पूर्व-निर्धारित होते हैं। स्वतंत्र चुनाव मशीनरी की परिकल्पना करना असंभव है। ऐसे राष्ट्र-राज्यों में लंबे समय तक एक पार्टी या एक विचार के लोग सत्ता पर क़ाबिज़ रहते हैं। सांस्थानिक भ्रष्टाचार, विरोधियों की हत्याएँ, लोकतांत्रिक नागरिकों का ग़ायब होना, असहमत आवाज़ों का दमन राज्य की कार्यप्रणाली का स्वाभाविक चरित्र बन जाता है। राजनीतिक नेतृत्व, राज्य मशीनरी और लंपट वाहिनियों के गठजोड़ द्वारा समाज पर नियंत्रण की सूक्ष्म प्रणाली थोप देता है।

हिंसा, षड्यंत्र, नफ़रती भेदभाव व विभाजनकारी विचार और व्यवहार राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत बन जाते हैं। क़ानूनों में निहित स्वार्थ के हित में बदलाव किए जाते हैं और उनकी व्याख्या सत्ता के राजनीतिक लाभ को देखकर की जाती है। विधायिका भक्त मंडली में बदल जाती है और न्यायपालिका, कार्यपालिका, सत्ता शिखर की सेवा में लगा दी जाती है।
सर्वोपरि एक महान रक्षक, उद्धारक, करिश्माई महानायक सत्ता के शिखर पर आरूढ़ हो जाता है। जो प्रश्नातीत होकर राष्ट्र-समाज का प्रतीक बन जाता है। उसकी आलोचना राष्ट्र की आलोचना, उसकी नीतियों का विरोध विकास-विरोध घोषित कर दिया जाता है। अंतत: राष्ट्र-राज्य का एक नेता में विलय हो जाता है।
यहाँ से आधुनिक फासीवादी तंत्र सक्रिय होता है और वह सब कुछ जो लोकतांत्रिक है, मानवीय है, वैज्ञानिक है – नष्ट हो जाता है।
एक और मॉडल इधर देखने को मिल रहा है। जिसमें एक-दो कॉर्पोरेट राज्य के साथ इस तरह से घुल-मिल जाते हैं कि पार्टी, सरकार और कॉर्पोरेट का अपवित्र गठबंधन ठोस शक़्ल ले लेता है। जिसके शिखर पर सर्वशक्तिमान तानाशाह विराजमान हो जाता है।
हम उदारीकरण के बाद के विश्व में इस तरह के राष्ट्र-राज्यों का उदय देख रहे हैं। जो आमतौर पर विकासशील पिछड़े देशों में आकार ले रहे हैं। जैसे ईरान, तुर्की, सऊदी अरब और रूस में दिखाई दे रहा है। कुछ दिनों पहले हमारे पड़ोसी मुल्क श्रीलंका और आज भी बर्मा से पाकिस्तान तक इसके कई रूप दिखाई देते हैं। आपने देखा है कि बांग्लादेश के प्रधानमंत्री शेख हसीना ने चुनावी भ्रष्टाचार के माध्यम से किस तरह की तानाशाही थोप दी थी। जिसके ख़िलाफ़ जन-विद्रोह ने जन्म लिया और आज वहाँ अराजकता का वातावरण है।

हालाँकि इन राष्ट्र-राज्यों में रूप (फ़ॉर्म) के स्तर पर कई तरह के फ़र्क दिखाई देते हैं। जहाँ रूस तकनीक और कॉर्पोरेट के युग्म द्वारा निर्मित तानाशाही का विशिष्ट मॉडल है। वहीं ईरान, तुर्की में धार्मिक कट्टरपंथी तानाशाहियाँ हैं। रूस में विपक्ष ख़त्म कर दिया गया है। ईरान और तुर्की में दिखावे के लिए चुनाव होते हैं। राजनीतिक हिंसा वहाँ के जीवन व शासन प्रणाली का बुनियादी गुण है। विरोधी कब ग़ायब हो जाएँगे, कुछ भी नहीं कहा जा सकता। लोकतांत्रिक विरोध के सारे रास्ते बंद हो जाने से नागरिक समाज विघटित हो जाता है। अंध राष्ट्रवाद और धार्मिक श्रेष्ठता व शुद्धता की कर्कश ध्वनि चारों तरफ़ सुनाई देती है। जिसके शोर में नागरिकों की आवाज़ घुटकर रह जाती है।
इसकी मार सबसे ज़्यादा कमज़ोर वर्गों जैसे महिलाओं, मज़दूरों, किसानों, लोकतांत्रिक नागरिकों पर पड़ती है। भारत जैसे देशों में अल्पसंख्यक (ख़ासकर मुस्लिम और ईसाई), एथनिक भाषाई समूह, दलित, महिला, आदिवासी समाज ही निशाने पर होंगे और ये राज्य दमन के दायरे में खींच लाए जाएँगे। या यूँ कहा जाए कि खींच लाए गए हैं।

संभवत: राहुल गांधी राज्य के अंग होने के कारण भारत गणराज्य के भविष्य को कई संदर्भों से देख रहे हों। लेकिन यह तो निश्चित है कि जब दो दिन पहले कर्नाटक के महादेवपुरा विधानसभा में वोटों की चोरी का तथ्यात्मक विवरण दे रहे थे। तो उनकी नज़र देश के 140 करोड़ लोगों की लोकतांत्रिक चेतना के उन्नत होने की तरफ़ रही होगी। क्योंकि उन्हें पता है कि मोदी के नेतृत्व में भारत में राज्य की सभी संस्थाएँ कॉर्पोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ के समक्ष समर्पण कर चुकी हैं। किसी भी संस्था से फासीवादी हमले के ख़िलाफ़ प्रतिरोध की उम्मीद नहीं की जा सकती है। (इसे सीबीआई के पूर्व निदेशक आलोक वर्मा प्रकरण से समझा जा सकता है।)
एकमात्र चुनाव आयोग ही है। जिस पर लोकतंत्र का बुनियादी ढाँचा टिका होता है। इसे संविधान संशोधन द्वारा मोदी को समर्पित कर दिया गया है। मोदी-शाह द्वारा नियुक्त चुनाव आयुक्त की यह हैसियत नहीं है कि वह किसी सांस्थानिक चुनावी भ्रष्टाचार व अनियमितता पर रोक लगा सके। आप देख रहे हैं कि राहुल गांधी के खुलासों के बाद चुनाव आयोग जनता में फैली आशंका को दूर करने की जगह कांग्रेस नेता के विरोध में सक्रिय हो गया। अब डराने-धमकाने का सिलसिला शुरू हो चुका है।

फ़िज़ा में जून 1975 की गर्म हवाएँ बह रही हैं और लोकतंत्र में चुनावी तानाशाही की आहट सुनाई देने लगी है। हम नहीं जानते कि भारतीय राष्ट्र-राज्य आगे किस दिशा में करवट लेगा। लेकिन यह स्पष्ट है कि लोकतंत्र के भविष्य के संकेत अच्छे नहीं हैं। वर्तमान दौर में लोकतांत्रिक भारत के भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता है।
लोकतंत्र के भविष्य की बागडोर विपक्षी इंडिया गठबंधन सहित सभी लोकतांत्रिक नागरिकों, संस्थाओं के साथ-साथ युवाओं, मज़दूरों, किसानों और संविधान के द्वारा आज़ादी, बराबरी और न्याय की उम्मीद लगाए नागरिकों के हाथ में है। उनके साहस, समझ, सक्रियता पर निर्भर करता है कि भविष्य में हमारे देश में लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा या नहीं।
हाँ, एल ओ पी राहुल गांधी ने आग से खेलने का संकेत देकर शायद देश को आश्वस्त करना चाहा है कि इस अंधकार के दौर में भी लोकतंत्र के लिए लड़ने वाली ताकतें सचेत हैं। संगठित होने के क्रम में हैं और लोकतंत्र पर हो रहे हमले का प्रतिरोध करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

(जयप्रकाश नारायण वामपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता हैं।)

Leave a Reply